
केंद्र सरकार की ओर से प्रयोगशालाओं में जानवरों पर परीक्षण को लेकर प्रस्तावित नए नियमों पर बहस तेज हो गई है। इस बीच जामिया हमदर्द के हेड ऑफ डिपार्टमेंट और सोसाइटी फॉर अल्टरनेटिव्स टू एनिमल एक्सपेरिमेंट्स के वाइस प्रेसिडेंट डॉक्टर शेख रईसुद्दीन ने इंडिया टीवी से खास बातचीत में इस मुद्दे पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि फिलहाल एनिमल टेस्टिंग को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है, लेकिन विज्ञान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से भविष्य में जानवरों पर प्रयोगों की निर्भरता काफी हद तक कम की जा सकती है।
केंद्र सरकार ने लैबोरेटरीज में जानवरों के इस्तेमाल को लेकर नया ड्राफ्ट जारी किया है, जिस पर 5 नवंबर तक आम नागरिकों, वैज्ञानिकों और दूसरे संबंधित पक्षों से आपत्तियां और सुझाव मांगे गए हैं। डॉक्टर शेख ने कहा कि सरकार की ओर से लोगों की राय मांगना एक अच्छा कदम है। हालांकि, प्रस्तावित नियमों में कुछ ऐसे प्रावधान हैं, जिन पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
एनिमल टेस्टिंग सिर्फ रिसर्च नहीं, अर्थव्यवस्था से भी जुड़ी
डॉक्टर शेख रईसुद्दीन ने कहा कि जानवरों पर प्रयोग केवल वैज्ञानिक अनुसंधान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था से भी जुड़े हुए हैं। दवाओं के विकास और औषधि उद्योग में इनका महत्वपूर्ण योगदान है। भारत कई देशों को दवाओं का निर्यात करता है और इस उद्योग का देश की जीडीपी में भी बड़ा योगदान है।
उन्होंने बताया कि ज्यादातर दवाओं की शुरुआती टेस्टिंग जानवरों पर की जाती है, क्योंकि किसी नई दवा का सीधे इंसानों पर परीक्षण करना संभव नहीं होता। लैब में मुख्य रूप से चूहे, रैट्स और खरगोश जैसे जानवरों का इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इनमें से कई प्रजातियों की लैब में ही ब्रीडिंग की जाती है और उन्हें नियंत्रित परिस्थितियों में तैयार किया जाता है।
जानवरों पर भी पड़ता है प्रयोगों का असर
डॉक्टर शेख ने माना कि प्रयोगों के दौरान जानवरों को दर्द, गंभीर बीमारी और कई बार जानलेवा स्थितियों से गुजरना पड़ता है। किसी दवा की अधिक खुराक देने से उनकी मौत भी हो सकती है। हालांकि, उन्होंने कहा कि यदि वैज्ञानिक तरीके से और उचित सावधानियों के साथ प्रयोग किए जाएं तो जानवरों को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।
उन्होंने इंसानों और जानवरों के बीच जैविक अंतर का उदाहरण देते हुए बताया कि रैट उल्टी नहीं कर सकते, जबकि इंसान किसी जहरीली या खराब चीज को खाने के बाद उल्टी कर सकता है। इसी तरह अलग-अलग प्रजातियों में दवाओं की प्रतिक्रिया भी अलग हो सकती है। इसलिए जानवरों पर किए गए प्रयोगों के नतीजों को इंसानों पर लागू करते समय सावधानी बरतना जरूरी है।
जानवरों पर सुरक्षित दवाएं इंसानों के लिए भी हो सकती हैं नुकसानदायक
डॉक्टर शेख ने स्वीकार किया कि कई बार जानवरों पर सुरक्षित पाई गई दवाएं इंसानों के लिए नुकसानदायक साबित हुई हैं। उन्होंने जेंटामाइसिन एंटीबायोटिक का उदाहरण देते हुए बताया कि इसके इस्तेमाल से किडनी से जुड़ी समस्याएं सामने आई थीं।
उन्होंने कहा कि इंसानों में भी उम्र और शारीरिक स्थिति के हिसाब से दवाओं की खुराक अलग होती है। बच्चों, वयस्कों और बुजुर्गों के लिए एक जैसी खुराक नहीं दी जा सकती। इसी तरह महिला और पुरुषों के हार्मोनल अंतर का भी दवाओं के प्रभाव पर असर पड़ सकता है। डॉक्टर शेख के मुताबिक, नई दवा विकसित करने में अरबों रुपये खर्च होते हैं और इसके पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य इंसानों की सेहत और सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
ऑर्गन ऑन चिप और AI से कम होगी एनिमल टेस्टिंग
यह पूछे जाने पर कि क्या विज्ञान के पास जानवरों के प्रयोगों के विकल्प मौजूद हैं, डॉक्टर शेख ने कहा कि इस दिशा में तेजी से काम हो रहा है। ऑर्गन ऑन चिप और ह्यूमन ऑन चिप जैसी तकनीकों की मदद से शरीर के अलग-अलग अंगों, जैसे लिवर और किडनी की कार्यप्रणाली का अध्ययन किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि नई अप्रोच मेथडोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भविष्य में एनिमल टेस्टिंग का विकल्प बन सकती हैं। हालांकि, व्यवहार से जुड़े अध्ययनों में अभी भी जानवरों पर प्रयोगों की जरूरत पड़ सकती है। उनका अनुमान है कि अगले एक दशक में कई क्षेत्रों में जानवरों पर प्रयोगों की आवश्यकता काफी कम हो जाएगी, लेकिन इसे पूरी तरह समाप्त करना आसान नहीं होगा।
कॉस्मेटिक टेस्टिंग के कई विकल्प पहले ही अपनाए जा चुके
डॉक्टर शेख ने बताया कि कई तरह के एनिमल एक्सपेरिमेंट्स को पहले ही आधुनिक तकनीकों से रिप्लेस किया जा चुका है। उन्होंने कॉस्मेटिक उद्योग का उदाहरण देते हुए कहा कि अब लैब में विकसित स्किन मॉडल का इस्तेमाल किया जा रहा है।
पहले त्वचा और आंखों पर किसी उत्पाद के प्रभाव की जांच के लिए खरगोशों पर परीक्षण किए जाते थे। इसमें उनकी आंखों में केमिकल डालकर प्रतिक्रिया देखी जाती थी। डॉक्टर शेख के मुताबिक, इस तरह के परीक्षणों के विकल्प विकसित हो चुके हैं और ऐसे प्रयोगों पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है।
जंगलों से जानवरों को पकड़ने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए
प्रस्तावित ड्राफ्ट के कुछ प्रावधानों पर चिंता जताते हुए डॉक्टर शेख ने कहा कि इसमें ऐसा प्रावधान दिखाई देता है, जिससे प्रयोगों के लिए जंगलों से जानवरों को पकड़ने की अनुमति मिलने की आशंका पैदा हो रही है।
उन्होंने कहा कि वन्यजीवों को किसी भी परिस्थिति में प्रयोगों के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। ऐसा होने पर लुप्तप्राय प्रजातियों पर खतरा बढ़ सकता है। उन्होंने जोर दिया कि वैज्ञानिक प्रयोगों के नतीजों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता भी जरूरी है, क्योंकि भारत की दवाओं और उत्पादों का निर्यात कई देशों में होता है।
संस्थागत कमेटियों की निगरानी में बाहरी सदस्यों की भूमिका जरूरी
ड्राफ्ट में माइल्ड और मॉडरेट प्रयोगों की मंजूरी संस्थागत कमेटियों को देने के प्रस्ताव पर डॉक्टर शेख ने कहा कि यदि ये कमेटियां ईमानदारी और नैतिकता के साथ काम करें तो इसमें कोई समस्या नहीं है।
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि कई बार शोधकर्ताओं की समय सीमा, पीएचडी और दूसरे दबावों के कारण कमेटियां भावनात्मक आधार पर फैसले ले सकती हैं। इसलिए संस्थागत निगरानी के साथ बाहरी सदस्यों की भागीदारी भी जरूरी है। इससे फैसलों में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनी रहेगी।
ड्राफ्ट में बदलाव को लेकर डॉक्टर शेख ने दिए सुझाव
डॉक्टर शेख रईसुद्दीन ने प्रस्तावित नियमों में कुछ महत्वपूर्ण सुधारों की जरूरत बताई। उनके मुताबिक, सबसे पहले वन्यजीवों को प्रयोगों से पूरी तरह बाहर रखा जाना चाहिए। इसके अलावा रिसर्च के दौरान तैयार होने वाले आंकड़ों की ट्रेसेबिलिटी सुनिश्चित होनी चाहिए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि प्रयोग कैसे किए गए और उनके नतीजे कितने विश्वसनीय हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि जहां जानवरों की ब्रीडिंग और देखभाल की जाती है, वहां साफ-सफाई, स्वच्छ वातावरण और बेहतर सुविधाएं होनी चाहिए। इससे जानवरों की सेहत के साथ-साथ वैज्ञानिक आंकड़ों की विश्वसनीयता भी बनी रहेगी।
भारत को ग्लोबल स्टैंडर्ड के मुताबिक बनाने की जरूरत
डॉक्टर शेख ने कहा कि अगर भारत को एनिमल फ्री रिसर्च के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल करना है तो उसे अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करना होगा। उन्होंने दवा उद्योग और आईटी सेक्टर का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत इन क्षेत्रों में अपनी पहचान बना चुका है। इसी तरह रिसर्च के क्षेत्र में भी वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य तकनीकों और नियमों को अपनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति में पशुओं के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना रही है। इसलिए इंसानों के स्वास्थ्य के साथ-साथ जानवरों के कल्याण को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
एनिमल टेस्टिंग पूरी तरह खत्म करना अभी संभव नहीं
डॉक्टर शेख ने साफ कहा कि मौजूदा वैज्ञानिक परिस्थितियों में एनिमल टेस्टिंग को पूरी तरह समाप्त करना किसी भी देश के लिए संभव नहीं है। AI और नई तकनीकें भविष्य में इसका विकल्प जरूर बनेंगी, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में जानवरों पर प्रयोगों की जरूरत बनी रह सकती है।
उन्होंने कहा कि सरकार के प्रस्तावित ड्राफ्ट को पूरी तरह खारिज करने के बजाय उसमें जरूरी संशोधन किए जाने चाहिए, ताकि वैज्ञानिक अनुसंधान आगे बढ़े, अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन हो और जानवरों के कल्याण से भी समझौता न हो।

