नई दिल्ली — नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक आधिकारिक पत्र लिखकर उन पर और सरकार पर असम्मानजनक व्यवहार और लोकतांत्रिक मूल्यों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि उन्हें संसद में बोलने से रोका जाना न केवल उन्हें व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाना है, बल्कि यह लोकतंत्र पर एक काला धब्बा भी है।
लोकसभा में मंगलवार को राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख एम. एम. नरवणे की अनप्रकाशित किताब से उद्धरण देने की कोशिश की, लेकिन स्पीकर ओम बिरला ने उन्हें बोलने से रोक दिया। इससे कांग्रेस के कई सांसदों में गुस्सा भड़का और उन्होंने सेक्रेट्री की मेज से कागज़ उठाकर स्पीकर की ओर उछाले।
🔹 इस पर संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने तीखी प्रतिक्रिया दी और उन सांसदों के खिलाफ निलंबन प्रस्ताव लाया।
🔹 ध्वनि मत से, कांग्रेस के आठ सांसद — जिनमें अमरिंदर सिंह राजा वारिंग, मणिक्कम टैगोर, गुरजीत सिंह औजला शामिल हैं — को मौजूदा सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया।
🔹 इसके बाद राहुल गांधी सदन के बाहर आए और कांग्रेस सांसदों के साथ मिलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ नारेबाजी की। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार उन्हें बोलने नहीं दे रही क्योंकि मोदी “डरते” हैं।
राहुल गांधी ने अपने पत्र में आरोप लगाया कि:
✔️ लोकसभा अध्यक्ष ने बिना उचित वजह उन्हें बोलने से रोका।
✔️ यह न केवल परंपरा का उल्लंघन है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा करने से रोकना लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
✔️ उन्होंने बताया कि सोमवार को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान उन्हें एक दस्तावेज़ का संदर्भ देना था, जिसे अध्यक्ष ने सत्यापित करने को कहा। राहुल ने कहा कि जब उन्होंने आज वही प्रक्रिया पूरी की, तब भी उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी गई।
उन्होंने पत्र में आगे लिखा:
- सदन में किसी सदस्य को दस्तावेज़ का हवाला देने की परंपरा और रूल बुक के अनुसार, सत्यापन के बाद सदस्य को बोलने की अनुमति मिलनी चाहिए।
- जब यह शर्त पूरी हो चुकी थी, तब भी उन्हें रोकना इतिहास में पहली बार जैसा कदम है।
- यह न केवल परंपरा का उल्लंघन है बल्कि नेता प्रतिपक्ष को महत्वपूर्ण विषय पर बोलने से रोकना लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।
राहुल गांधी ने कहा है कि यह कदम लोकतांत्रिक सैद्धांतिक मूल्यों के खिलाफ है और उन्होंने इसका कड़ा विरोध दर्ज कराया है।
यह मामला खास तौर पर उस व्यापक विवाद के बीच आया है जिसमें विपक्ष सरकार से यह पूछ रहा है कि वह चीन और पाकिस्तान से जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों पर खुलकर चर्चा क्यों नहीं होने दे रहा।
