सोशल मीडिया पर कथित रूप से अभद्र भाषा और गाली-गलौज करने वाले छात्रों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में मांग की गई है कि ऐसे युवाओं को दंडात्मक कार्रवाई के बजाय सामुदायिक सेवा करने का निर्देश दिया जाए, ताकि उनमें सामाजिक जिम्मेदारी और अनुशासन की भावना विकसित हो सके। सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है और इसकी सुनवाई बुधवार को होने की संभावना है।
यह याचिका भारतीय वायुसेना के एक सेवानिवृत्त अधिकारी की ओर से दायर की गई है। याचिकाकर्ता ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन का हवाला देते हुए कहा है कि सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों के आयोजकों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए। उनका कहना है कि विरोध प्रदर्शन के दौरान और उसके बाद सोशल मीडिया पर जिस तरह की अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया, वह सामाजिक मर्यादा के खिलाफ है और इस पर सुधारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए।
गौरतलब है कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर छात्रों ने संसद मार्च निकाला था। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई, जिसमें पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया, जबकि प्रदर्शनकारियों की ओर से भी पथराव किए जाने के आरोप लगे। इस घटना में कई पुलिसकर्मी और प्रदर्शनकारी घायल हुए थे। इसके बाद सोशल मीडिया पर कुछ प्रदर्शनकारियों के वीडियो सामने आए, जिनमें कथित तौर पर पुलिस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया।
इनमें से एक वीडियो में एक किशोरी द्वारा प्रधानमंत्री और उनके परिवार के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी किए जाने का मामला भी सामने आया था। वीडियो वायरल होने के बाद उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। बाद में किशोरी ने खुद को 15 वर्षीय छात्रा बताते हुए कहा कि वह दूसरों के उकसावे में आ गई थी और अपने व्यवहार के लिए देश से सार्वजनिक माफी भी मांगी।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि ऐसे मामलों में केवल दंड देने के बजाय सुधारात्मक उपाय अधिक प्रभावी हो सकते हैं। इसलिए अदालत युवाओं को सामुदायिक सेवा करने का निर्देश दे, ताकि वे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझ सकें। अब इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और संभावित टिप्पणी पर सभी की निगाहें टिकी हैं।
