हाल ही में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड को लेकर ज़िद ने वैश्विक राजनीति में भू-रणनीतिक हलचल पैदा कर दी है। यह मुद्दा फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि 21वीं सदी का एक वास्तविक राजनीतिक और कूटनीतिक प्रश्न है — क्या कोई देश दूसरे देश के एक पूरे प्रांत को खरीद सकता है?
विदेश मामलों के विशेषज्ञ रोबिंदर सचदेव के साथ इंडिया TV के विशेष इंटरव्यू के आधार पर, हम इस जटिल विषय को समझने की कोशिश करते हैं — NATO में दरार, अमेरिका की भू-रणनीति, यूरोप की चिंताएँ, रूस-चीन का रिएक्शन और भारत के लिए संभावित अवसर।
🌍 1. ट्रंप की “ग्रीनलैंड जिद” — क्या है मामला?
• ग्रीनलैंड, जो वर्तमान में डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है, भू-राजनीतिक रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। वहाँ के पिघलते ग्लेशियर्स के नीचे अरबों डॉलर के खनिज संसाधन होने का अनुमान है — खासकर रेयर अर्थ मिनरल्स सहित अन्य महत्वपूर्ण खनिज।
• ट्रंप के विचार में, यदि अमेरिका ग्रीनलैंड में प्रभाव बढ़ा सके, तो उसे भू-रणनीतिक, आर्थिक और समुद्री मार्गों में बड़ा लाभ होगा — जैसे उत्तरी समुद्री मार्ग (North Sea Route) जो यूरोप और अमेरिका व अन्य देशों के बीच मार्ग को छोटा कर देगा।
• अमेरिका का इतिहास भी इससे अनजान नहीं — उसने लुइसियाना (फ्रांस से) और अलास्का (रूस से) खरीदा था, इसलिए ट्रंप ऐसी किसी भू-राजनीतिक ‘विस्तारवादी’ सोच को अपना रहा है।
🧭 2. NATO में दरार — क्या ट्रंप इसे कुर्बान कर देंगे?
• डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने चेतावनी दी कि ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी दवाब NATO में दरार की शुरुआत हो सकता है।
• सचदेव के अनुसार:
✦ यूरोप के लिए NATO एक सुरक्षा कवच है — रूस जैसे खतरे के खिलाफ।
✦ यदि अमेरिका ऐसा unilateral कदम उठाता है (जैसे ग्रीनलैंड को अपने नियंत्रण में लेना), तो अन्य यूरोपीय देश — विशेषकर फ्रांस, जर्मनी, इटली आदि — अमेरिका के प्रति भरोसा कम कर सकते हैं।
✦ हालांकि NATO पूरी तरह खत्म नहीं होगा, लेकिन विश्वास की दरार निश्चित रूप से बढ़ सकती है।
🔥 3. यूरोप का दुविधाग्रस्त रुख
• यूरोपीय संघ के कुछ नेता रूस के साथ बातचीत के पक्षधर हैं, जबकि कुछ पूर्वी यूरोपीय देश रूस को लेकर चिंतित हैं।
• यूरोप की रक्षा क्षमता कम है और अमेरिका पर काफी निर्भर है। यदि अमेरिका NATO के प्रति सहयोग कम करे, तो यूरोप की रणनीति पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा।
• यूरोपीय देशों के बीच भी तनाव है — पूर्वी यूरोप (जैसे पोलैंड, लिथुआनिया) और पश्चिमी यूरोप के बीच रक्षा नीतियों पर मतभेद हैं।
🪖 4. रूस और चीन क्यों मुस्कुरा रहे हैं?
• रूस पहले से ही अपने “बैकयार्ड” में सक्रिय है — यूक्रेन से लेकर अपने पड़ोस में सेना और आधार बढ़ा रहा है।
• चीन भी ग्रीनलैंड जैसे क्षेत्र पर “अपना दायरा” मान सकता है — जैसे वह ताइवान को अपने भीतर मानता है।
• ट्रंप की नीतियाँ अमेरिका के परंपरागत सहयोगियों से दूरी बनाए हुए हैं, जिससे रूस-चीन को यह कहने का मौका मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अमेरिका-नियंत्रित नहीं है।
🔎 5. भारत के लिए सुनहरा अवसर?
विशेषज्ञ सचदेव का मानना है कि मौजूदा वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल में यूरोप को अब भारत को “चौथा पोल” (Fourth Pole) के रूप में देखना चाहिए — अमेरिका, रूस और चीन के अलावा:
🟡 भारत का लाभ:
- विशाल बाजार और युवा कार्यबल
- तकनीकी क्षमता और आर्थिक वृद्धि
- यूरोप की गिरती जनसंख्या के बीच भारतीय कार्यबल की मांग
- रणनीतिक भागीदारी के लिए मजबूत पैनल
📌 यूरोप को भारत के साथ:
- व्यापार,
- रक्षा सहयोग,
- मानव संसाधन साझेदारी और
- तकनीकी गठजोड़
जैसे क्षेत्रों में रिश्ते मजबूत करने चाहिए।
⚖️ 6. कानूनी पक्ष — क्या ग्रीनलैंड “बेचा” जा सकता है?
• किसी देश को जब तक वह खुद बेचना न चाहे, अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कोई राज्य अधिग्रहित नहीं किया जा सकता।
• ट्रंप प्रशासन इसे 1803 की लुइसियाना खरीद जैसा मानता है, जबकि अन्य इसे आत्मनिर्णय (Right to Self-Determination) का उल्लंघन बताते हैं।
• ग्रीनलैंड के लोगों की संख्या बहुत कम (~60,000), और वहाँ पहले से ही स्वशासन है — केवल रक्षा, विदेश नीति डेनमार्क संभालता है।
🔹 2009 में वहाँ एक जनमत संग्रह भी हुआ था, जिसमें स्वशासन और संभावित स्वतंत्रता के विकल्प पर विचार किया गया था।
📌 निष्कर्ष
✔️ ग्रीनलैंड विवाद भू-राजनीति की एक ज्वलंत मिसाल है जिसमें
संसाधन,
समुद्री मार्ग,
वैश्विक शक्ति संतुलन और
अंतरराष्ट्रीय कानून के पहलू जुड़े हैं।
✔️ NATO पर प्रभाव — एक कठिन चुनौती, पर पूरी तरह टूटता हुआ गठबंधन नहीं लगता।
✔️ भारत के लिए अवसर — दुनिया की बहुपक्षीय राजनीति के बीच भारत को एक भरोसेमंद, स्थिर और शक्तिशाली साझेदार के रूप में उभरने का मौका मिल सकता है।
✔️ सबसे बड़ी सीख — आज का विश्व एक-ध्रुवीय नहीं, बल्कि बहु-ध्रुवीय है, और भारत की भूमिका इस नई वैश्विक संरचना में महत्वपूर्ण बनती जा रही है।
